रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई सालों से जारी जंग को रुकवाने के लिए पर्दे के पीछे शह और मात का खेल चल रहा है। तुर्की ने एक बार फिर से मसीहा बनने की कोशिश की और दोनों देशों के बीच सुलह का रास्ता निकालने का प्रस्ताव रखा। लेकिन मॉस्को से जो जवाब आया, उसने अंकारा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। व्लादिमीर पुतिन के दफ्तर यानी क्रेमलिन ने तुर्की के इस शांति प्रस्ताव को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
भारतीय मीडिया में इस खबर को अक्सर इस नजरिए से देखा जा रहा है कि पाकिस्तान का साथ देने वाले तुर्की को रूस ने करारा जवाब दिया है। सच कहूं तो यह सिर्फ आधा सच है। असली भू-राजनीति इससे कहीं ज्यादा पेचीदा और गहरी है। आपको इस पूरे मामले को केवल भारत-पाकिस्तान के चश्मे से देखने के बजाय इस महायुद्ध के असली समीकरणों के साथ समझना होगा। For an alternative view, check out: this related article.
क्रेमलिन ने आखिर क्या कहा है
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने साफ शब्दों में कहा है कि फिलहाल यूक्रेन के साथ शांति वार्ता फिर से शुरू होने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। उन्होंने तुर्की की कोशिशों की तारीफ जरूर की और शिष्टाचार के नाते धन्यवाद भी कहा। पेसकोव का कहना था कि रूस अपने तुर्की दोस्तों की इस इच्छा की सराहना करता है कि वे शांति का रास्ता बनाना चाहते हैं।
लेकिन इस मीठी बात के ठीक बाद पेसकोव ने जो कड़वा सच बोला, वही इस पूरी कहानी का मुख्य हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि इस समय बातचीत की मेज पर लौटने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। इसका मतलब बहुत सीधा है। रूस अभी झुकने या समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं है। Similar analysis on this trend has been provided by The Guardian.
यूक्रेन ने हाल ही में प्रस्ताव दिया था कि तुर्की के इस्तांबुल को दोनों देशों के राष्ट्रपतियों यानी वलोडिमिर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन के बीच सीधी मुलाकात का मंच बनाया जा सकता है। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने खुद इसकी पैरवी की थी। लेकिन पुतिन ने इस विचार को सिरे से खारिज कर दिया।
तुर्की की शांति दूत बनने की छटपटाहट
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए छटपटा रहे हैं। इसके पीछे उनकी अपनी कूटनीतिक मजबूरियां और फायदे हैं।
तुर्की एक तरफ नाटो (NATO) का सदस्य है, जो यूक्रेन को सैन्य मदद देता है। दूसरी तरफ, तुर्की का रूस के साथ बहुत बड़ा व्यापारिक और रक्षा सौदा है। वह रूसी गैस खरीदता है और उसने रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी खरीदा है।
इस दोहरी नीति की वजह से तुर्की खुद को एक ऐसे निष्पक्ष खिलाड़ी के रूप में पेश करना चाहता है जो दोनों पक्षों को मंजूर हो। इससे पहले भी तुर्की ने दोनों देशों के बीच ब्लैक सी ग्रेन डील करवाई थी, जिससे दुनिया भर में अनाज की आपूर्ति बहाल हो सकी थी。 लेकिन इस बार पुतिन ने एर्दोगन के इस कूटनीतिक कार्ड को चलने ही नहीं दिया।
पाकिस्तान कनेक्शन और भारत का नजरिया
अब बात करते हैं उस एंगल की जो इस समय खूब चर्चा में है। तुर्की को हमेशा से पाकिस्तान का करीबी सहयोगी माना जाता रहा है। कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया है। यही वजह है कि जब रूस ने तुर्की के प्रस्ताव को झटका दिया, तो इसे भारत में "पाकिस्तान के दोस्त को सबक" के तौर पर देखा जाने लगा।
लेकिन आपको यह समझना होगा कि पुतिन ने तुर्की का प्रस्ताव इसलिए खारिज नहीं किया कि वह पाकिस्तान का दोस्त है। पुतिन का यह फैसला पूरी तरह से यूक्रेन युद्ध की जमीनी हकीकत और रूस के अपने राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। रूस इस जंग में अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां वह अपनी शर्तों पर ही पीछे हटेगा, किसी तीसरे देश के दबाव या मध्यस्थता में नहीं।
आखिर क्यों अड़ी हुई है बात
रूस और यूक्रेन के बीच सुलह का रास्ता इतना आसान नहीं है। दोनों देशों की शर्तें एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।
रूस की मांगें बहुत स्पष्ट हैं। वह चाहता है कि यूक्रेन अपने उन चार क्षेत्रों (डोनेट्स्क, लुहान्स्क, जापोरिज्जिया और खेरसॉन) पर रूस के नियंत्रण को हमेशा के लिए स्वीकार कर ले, जिन पर रूस ने कब्जा कर रखा है। साथ ही यूक्रेन को यह लिखित गारंटी देनी होगी कि वह कभी भी नाटो का हिस्सा नहीं बनेगा।
यूक्रेन की शर्तें इसके बिल्कुल उलट हैं। जेलेंस्की का कहना है कि जब तक रूसी सेना यूक्रेन की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल जाती और 2014 में कब्जाए गए क्रीमिया को वापस नहीं कर देती, तब तक कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो सकता।
इन दो धुर विरोधी दावों के बीच तुर्की या कोई भी अन्य देश चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, समझौता होना लगभग असंभव है। पुतिन जानते हैं कि युद्ध के मैदान में उनकी स्थिति मजबूत है, इसलिए वे किसी भी ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे जो उन्हें पीछे हटने पर मजबूर करे।
आगे क्या होगा
क्रेमलिन के इस ताजा रुख से यह बिल्कुल साफ है कि आने वाले दिनों में जंग और तेज हो सकती है। तुर्की के प्रस्ताव को खारिज करके रूस ने यह संदेश दे दिया है कि वह लंबी लड़ाई के लिए तैयार है। यूक्रेन के भीतर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल और सरकार में हो रहे बड़े बदलावों पर भी क्रेमलिन की नजर है, लेकिन उनका साफ कहना है कि जब तक कीव में कोई ऐसा नेतृत्व नहीं आता जो बातचीत के लिए गंभीर हो, तब तक चेहरों के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला。
यदि आप इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं, तो यह मानकर चलिए कि आने वाले हफ्तों में फ्रंटलाइन पर सैन्य दबाव और बढ़ेगा। तुर्की की कूटनीतिक कोशिशें फिलहाल नाकाम हो चुकी हैं और अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिका या चीन इस मामले में क्या अगला कदम उठाते हैं।